मेरे कितने जिद करने पर तुमने मुझे चूमने के लिए अपने होंठो को आगे कर दिया था.. आँखे भी बंद थी तुम्हारी.. तुम्हारी वह मासूमियत देख कर तुम्हारे होंठो को चूम भी नहीं पाया था मैं.. बस देखता रह गया था वह समर्पण.. कुछ देर बाद आँखें खोलने पर तुमने मुझे मुस्कुराता पाया था.. तुम झेंप गई थी.. झेंप मिटाने कि कोशिश में मुझसे लड़ पड़ी थी.. मगर मैंने तुम्हारी वह छवि आँखों में बंद कर ली थी.. आँखों में अब भी तुम्हारी वह छवि कैद है.. इन्हें आजाद करने के लिए मुझे तुम्हे चूमना जरूरी है.. किसी को यूँ ही कैद में नहीं रखना चाहिए..

देर रात ट्रेन कि खिडकी से झांकते चाँद को देख तुम्हे अक्सर मेरी याद आ जाती थी.. तुम्हारा ख़्वाब था कि कभी मैं भी इन रूमानी हालातों में तुम्हारे साथ रहूँ, चाँद के साथ चलूँ.. यह सब फोन पर उसी वक्त बताया था तुमने.. रेल कि खिडकी से मैं भी अक्सर झांकता हूँ.. साथ दौड़ते कई तारों को देखता हूँ जो अचानक उलझते-सुलझते रहते हैं.. रिश्ते भी अक्सर उतनी ही तेजी से उलझ जाया करते हैं.. काश रिश्ते भी उसी तेजी से मैं सुलझा पाता कभी.. एक हुनर सीखनी बाकी है अभी..

तुम मेरे सीने पर सर रख कर सोना चाहती थी.. उस दिन मेरे सीने पर सर रखकर सोते हुए कहा था तुमने.. जाने किस भय से मुझमे समा जाना चाहती थी तुम.. उस दिन तुम दरवाजे को बंद करना भूल गई थी.. संयोग से कोई गुजरा नहीं वहाँ से.. वह पहला और आखिरी दिन था.. आख़िरकार तुम्हारे ख़्वाब पूरे हो गए थे, मेरे सीने पर सर रख कर सोने का.. कुछ ख्वाहिशें अधूरी है अभी.. जिंदगी से कुछ विशलिस्ट उधार ले रखा है.. कुछ ख़्वाब अभी भी तुम्हारी राह तक रहे हैं.. तुम्हारा आना जरूरी है अब.. ख़्वाबों को भी उनकी जमीन मिलनी चाहिए जहाँ वह कुछ और ख़्वाब पैदा कर सके.. तुम्हारा इन भूमिहीन ख़्वाबों से सामंतों सा व्यवहार ठीक नहीं है..

उस दिन तुम्हारे जाने से पहले जिद कि थी, उस मीठी वाले कैंडी की, उसी बनिए के दूकान से.. जिसे पूरी नहीं कर सका था मैं.. रविवार जो था उस दिन.. बंद दुकानों का बंद दिन.. सोचा अगली बार वह जिद पूरा कर दूँगा.. वह अगली बार कभी नहीं आया.. जिंदगी के दोराहे में दोनों अलग हो गए, कभी ना मिलने के लिए.. थोडा दंभ, थोड़ी बेफिक्री में और अधिक लाचारी में सोचा कहाँ जायेगी? वह जो एक क्षण भी मेरे बगैर नहीं रह पाती है.. दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनो में और महीने सालों में बदलते गए.. नहीं आना था तुम्हे, नहीं आयी.. मैंने कहा था ना तुम्हे, एक हुनर सीखनी बाकी है अभी.. समझती क्यों नहीं हो तुम?

अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..
वो जो बहते थे आबसार कहाँ..

आँख के एक गाँव में, रात को ख़्वाब आते थे..
छूने से बहते थे, बोले तो कहते थे..
उड़ते ख़्वाबों का एतबार कहाँ..
अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..

जिन दिनों, आप थे, आँख में धूप थी..
जिन दिनों आप रहते थे..
आँख में धूप रहती थी..
अब तो जाले ही जाले हैं..
ये भी जाने ही वाले हैं..
वो जो था दर्द का, करार कहाँ..
अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..

अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..
वो जो बहते थे आबसार कहाँ..

Ishqiya – 03 – Ab …

Note – कंचन दीदी के शह पर लिखा गया यह पोस्ट. 🙂

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