११ मार्च को आखिरी दफ़े कुछ लिखा था यहाँ.. १५ दिन से ऊपर गुजर गए हैं यहाँ कुछ भी लिखे हुए.. मैं कभी भी इस मुगालते में नहीं रहा कि लोग मुझे पढ़ने को बेचैन हैं और मुझे अपने पाठकों के लिए कुछ लिखना चाहिए.. मुझे पता है कि लोगों कि यादाश्त बहुत कमजोर होती है और जो सामने उन्हें दिखता है बस उसे ही याद करती है.. बाकी बाते तो इतिहास के पन्नों में छिप जाया करती है.. अच्छे-अच्छे लेखक को भी लोग भूल जाया करते हैं, मैं तो लेखक भी नहीं हूँ..

कई लोग हैं जो मुझसे यह बात पूछ चुके हैं कि तुम कुछ लिख क्यों नहीं रहे हो? कुछ फोन पर, कुछ चैट पर और कुछ ई-पत्र के जरिये.. मैं अच्छे से जानता हूँ कि इसका कारण मेरा लिखा पढ़ने कि इच्छा के बदले उनको यह जानने कि उत्सुकता है कि मैं कभी भी इतने अंतराल तक अपने ब्लॉग को खाली नहीं छोड़ा करता हूँ.. आज भी कुछ बकवास ही लिख कर जा रहा हूँ..

चलिए मैं बता ही देता हूँ कि इन दिनों क्या किया?

इन दिनों खूब पढ़ा हूँ, जिसमे कंप्यूटर कि किताबों से लेकर साहित्य और दर्शन तक शामिल है.. अभी भी कई किताबें बची हुई है जो समयाभाव में मेरी राह तक रही हैं.. अपने स्वाभानुसार खूब सोचा भी हूँ, जिसमे इन साहित्य और दर्शन से लेकर अपने जीवन और भविष्य से संबंधित बाते भी हैं.. कई नए अनुभव भी मिले हैं इन पन्द्रह दिनों में ही जो शायद जीवन में तब तक काम आयें जब तक उसे गलत साबित करने वाले नए तथ्य सामने ना आ जाये..

काफी कुछ लिखा भी हूँ.. मगर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए.. किसी और को उस जगह झाँकने नहीं देना चाहता हूँ.. क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदी ब्लॉग जगत अभी तक उतना मैच्योर नहीं है कि उसे हजम कर सके.. लोग यहाँ चार-पांच साल पुराने लिंक को भी संभाल कर रखते हैं जिससे समय आने पर सामने वाले पर कीचड़ उछाला जा सके.. सामने वाले को नंगा कर खुद को सभ्रांत लोगों में शुमार दिखना चाहते हैं.. कुछ कुछ यही हाल मैं समाज के बारे में भी कहूँगा.. समाज के लोग तिलमिला उठते हैं ऐसी बाते सुनकर.. अपनी भ्रांतियों को टूटते देखना उनकी आदत में नहीं है.. कुछ लोग जल्दी और कुछ देर से मगर तिलमिलाते सभी हैं, और उसपर भी अगर बात सच्ची हो और उसे काटने का कोई तर्क उन्हें नहीं दिखे तो उसे अश्लील या वल्गर कहकर ख़ारिज कर देना चाहते हैं..(सनद रहे कि मैं भी इसी समाज और हिंदी ब्लॉग जगत ही ही बासिन्दा हूँ.. सो यह सब मुझपर भी लागू होता है..)

सभी कुछ लिखता हूँ अपनी वेब डायरी में.. एक ऐसे ब्लॉग पर जो मेरा नितांत निजी ब्लॉग है और उसपर मेरे अलावा किसी और को भटकने का अधिकार मैंने नहीं दिया है.. कुछ ख़्वाब ख्यालात कि बाते भी हैं उस पर, कुछ रूमानी बाते भी और कुछ समाज, दोस्ती और रिश्तों कि बाते भी.. कुछ बाते मैंने अपने कुछ मित्रों से भी कि उन विषयों पर जिन पर मैंने वहाँ लिख छोड़ा है, मगर उनके शब्द या व्यवहार फिर से बिना किसी तर्क के उसे ख़ारिज करने पर ही लगा हुआ था.. हो सकता है कि कभी मैं खुद ही उन्हें खारिज कर दूं, और बिना किसी गवाह या सबूत के उसे डिलीट होने का सजा भी सुना दूँ..

फिलहाल जिन किताबों को पढ़ रहा हूँ उसका चित्र मैं यहाँ लगा रहा हूँ.. जिन्हें जल कर ख़ाक होना है वह हो जाए और जिन्हें यह सोचकर गर्व करने का मौका मिल जाए कि “हुंह, यह सब तो मैंने दस साल पहले ही पढ़ रखे हैं” तो वे गर्वित भी हो सकते हैं..

कुछ अंग्रेजी कि पुस्तके भी हैं, जिनकी तस्वीर यहाँ नहीं लगा रहा हूँ, जिनमे प्रमुख रूप से रोबिन शर्मा कि किताबें शामिल है..

फुटकर नोट : कभी कभी लगता है वे मनुष्य जो सबसे अधिक अनैतिक होते हैं, नैतिकता का सबसे बड़ा लेक्चर उन्ही के पास होता है..

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