कल रात घर पर फोन से बातें हुई.. बातें शुरू होते ही बातों का रूख अचानक से मेरे चिट्ठे की ओर घूम गया.. एक एक करके सभी “एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी” वाले पोस्ट पर अपने विचार व्यक्त करने लगे.. यूं तो मुझे पता है कि मेरे हर पोस्ट को मेरे घर में सभी पढते हैं मगर मेरे उस पोस्ट पर कल पहली बार भैया कमेंट करने कि कोशिश भी किये जिसमें असफल रह गये(नेट कनेक्शन कि कुछ दिक्कत थी उन्हें) और आज फिर से उन्होंने कोशिश कि और उनका कमेंट कुछ यूं था.. सच कहूँ तो मुझे लगता है कि जब भी मैंने आपका कोई स्तम्भ पढा है तो मुझे उसमें कुछ ना कुछ खामियाँ ही नज़र आयी, इसमें भी है जैसे कि सीतामढी होता है ना कि सितामढी, पर आपने इतने दिल से लिखा है कि आँखें नम हो गयी। अचानक ही लगा कि मैं 20 साल पीछे चला गया हूँ, वही सब कुछ आँखों के सामने आ गया।

उन्होंने सच ही लिखा है.. इससे पहले जो कुछ भी मैं लिखता था उसमें बस मेरी यादें जुड़ी रहती थी मगर उस पोस्ट में बस मेरी ही नहीं पापा-मम्मी, भैया-दीदी, सभी कि यादें जुड़ी हुई थी.. तभी पापाजी से मैंने पूछा कि आप कितने दिनों के लिये चक्रधरपुर गये थे? उन्होंने कहा शायद 2-3 महीनों के लिये.. तभी पीछे से मम्मी कि आवाज आयी कि नहीं बस 1 महीने में ही लौट आये थे.. मेरे मन में यह बात आयी कि सच में जब इंतजार का लम्हा बहुत लम्बा हो जाता है तब एक-एक दिन महिनों कि तरह गुजरता सा मालूम होता है..

उस पोस्ट पर कुछ यादगार कमेंट्स भी आये जिनकी चर्चा अगर मैं यहां नहीं करूं तो यह मेरे पाठकों के साथ अन्याय ही होगा.. डा.अमर कुमार जी ने तो पूरी एक कविता और एक पोस्ट ही उस पर ठेल दी.. मैंने पापाजी को कहा था कि वो कविता मैं उन्हें मेल करूंगा मगर आज फिर से उसे यहीं डा.साहब से पूछे बिना ही अपने पोस्ट पर डाल रहा हूं.. मैं उम्मीद करता हूं कि वो से अन्यथा नहीं लेंगे..

आहः पुछरू, निमिष मात्र में
तुमने मुझे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया,
सीतामढ़ी के आगे का स्टेशन रीगा,
उसके बगल ही में सुगर फ़ैक्टरी,
आहः पुछरू,जीते रहो !

ठीक उसके पीछे एक गाँव उफ़रौलिया,
जिसकी पगडंडियों पर ऊँगली पकड़ कर चलते हुये,
अपने बाबा से मिलती संस्कार शिक्षा…
सबकुछ अब जैसे बिखरा हुआ है, वहाँ !
आहः पुछरू,जीते रहो !

आधा गाँव तो कलकत्ता कमाने पहुँचा
बाकी को पटना मुज़फ़्फ़रपुर राँची ने निगल लिया।
बचे फ़ुटकर जन छिटपुट शहरों में हैं,
एक नाम उफ़रौलिया को जीते हुये …
आहः पुछरू,जीते रहो !

कसमसाते हुये, लाल टोपी को कोसते हुये
उफ़रौलिया की गलियों में विचर रहेः हैं
उम्र की इस ठहरी दहलीज पर
उस माटी में लोटते हुये
आहः पुछरू,जीते रहो !

पर मैं भी कितना स्वार्थी हूँ कि
यह सब याद करते करते जाने कहाँ खो गया
और तुम्हारी गदहिया पर
कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी ..
आहः पुछरू,जीते रहो !

यह मेरे पोस्ट का सौभाग्य ही है जो किसी और को भी यादों कि गलियों में भटका गया.. आपका बहुत बहुत धन्यवाद डा.साहब..

उस पोस्ट को पढने के बाद ज्ञान जी भी यादों कि गलियों में ही भटकते पाये गये.. उन्हें बचपन में गाया गया यह गीत याद हो आया..
तीसी क तेल
भांटा क फूल
हम तुम अकेल
जूझैं बघेल!

नीतिश राज जी ने कहा – पुराने दिनों की याद ताजा कर दी आपने प्रशांत। बहुत ही अच्छा लिखा है। साथ में एक बात और लगता है आपके पिताजी के ट्रांस्फर के कारण आप भी कई जगह देख चुके हैं। उसके ऊपर भी लिखिएगा कभी यदि मौका लगे तो जगहों के बारे में।

मेरा कहना है – नीतिश जी, मैं जरूर लिखूंगा.. आखिर कभी ना कभी यह पोटली भी तो खुलनी ही चाहिये..

दिनेश जी का कमेंट भी दिल को छू गया.. उन्होंने लिखा – यह वही चिड़िया है फिर से जनम पा कर आप के पास चली आयी है। पुराने दिनों की याद दिलाने।

अनिल जी, जितेन्द्र जी, लवली, ताऊ जी, दीपक जी, अनुराग जी, भूतनाथ जी, अनुप शुक्ल जी ने भी इसे सराहा.. सभी को यह यादें कहीं ना कहीं खींच कर अपने साथ लेती चली गई..

पूजा जी ने देर से मगर लिखा – यादों की गलियों से गुजरना अच्छा लगा. चिट्ठी के बारे में मेरा भी यही ख्याल है, हाथ के लिए ख़त में एक खास अपनापन होता है. शब्दों पर उँगलियाँ फेर मन लिखनेवाले के पास पहुँच जाता है. बिल कुल दिल से आपने लिखा है. मुझे भी अपना बचपन और गाँव याद आ गया. आज के इस भाग-दौड़ की दुनिया में अगर किसी को किसी कि याद दिला कर दो पल के लिये चैन कि दुनिया में मैं लौटा ले गया.. अब इससे बड़ी खुशी मेरे लिये और क्या हो सकती है?

आज मेरे लिये एक और बड़ी खुशी कि बात है.. आज मेरे भैया सुस्मित प्रियदर्शी का जन्मदिन भी है.. आप भी लगे हाथों उन्हें बधाईयां देते जाईये.. 🙂

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